PM मोदी की इज़राइल यात्रा 2026: दोस्ती या आतंकवाद का समर्थन? 

GAZA क़त्लेआम और बच्चों का क़ातिल ISRAEL

Modi netanyahu dosti


BHARAT, 26 फ़रवरी 2026 – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज इज़राइल पहुँचे हैं,

 जहाँ उन्होंने इज़राइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात की। यह मोदी इज़राइल यात्रा 2026 को ऐतिहासिक बताया जा रहा है, लेकिन 

सवाल यह है कि क्या यह दोस्ती गाज़ा में इज़राइली आतंकवाद और क़त्लेआम को नज़रअंदाज़ कर रही है? इज़राइल, जो गाज़ा में हज़ारों बेगुनाह फ़िलिस्तीनी बच्चों का क़ातिल है, , इसके साथ भारत-इज़राइल दोस्ती का क्या मतलब?

Modi-Netanyahu मुलाकात

मोदी जी ने यरुशलम में इज़राइली संसद (केनेस्सेट) को संबोधित किया। 

उन्होंने 7 अक्टूबर हमास हमले को ‘बर्बर आतंकवादी हमला’ कहा। भारत-इज़राइल रक्षा समझौता, सुरक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी में नए M.O.U साइन होने की उम्मीद है। नेतन्याहू ने मोदी का भव्य स्वागत किया और दोनों नेताओं ने याद वाशेम होलोकॉस्ट मेमोरियल का दौरा किया।

यह यात्रा 25 फ़रवरी 2026 तक चल रही है। मोदी इज़राइल यात्रा समाचार में यह द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने की बात है, लेकिन GAZA  संकट को भुलाया नहीं जा सकता।

Gaza undar attack


इज़राइल आतंकवादी राज्य: गाज़ा क़त्लेआम और बच्चों का क़ातिल

इज़राइल को आतंकवादी देश कहा जाता है क्योंकि गाज़ा में इज़राइली सेना ने पिछले सालों में 70,000 से ज़्यादा लोगों को मारा है। 

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स के अनुसार, इनमें अधिकांश महिलाएँ और छोटे बच्चे थे। इज़राइली हवाई हमलों ने अस्पतालों, स्कूलों और घर बर्बाद किए हैं।

गाज़ा को इज़राइल ने खुली जेल बना दिया है, जहाँ लोगों को पानी, बिजली और खाना तक नहीं मिलता। इज़राइल-गाज़ा युद्ध में क़त्लेआम की निंदा पूरी दुनिया कर रही है। 

क्या मोदी-इज़राइल दोस्ती यह ज़ुल्म को समर्थन कर रही है?

भारत-फ़िलिस्तीन संबंध: ऐतिहासिक समर्थन से वर्तमान चुनौती तक

भारत के फ़िलिस्तीन के साथ संबंध ऐतिहासिक तौर पर मज़बूत रहे हैं, जो आज मोदी सरकार की इज़राइल दोस्ती से ख़तरे में पड़ गए हैं। 1947 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीन के विभाजन के विरुद्ध वोट दिया था और महात्मा गांधी से लेकर जवाहरलाल नेहरू तक के नेताओं ने फ़िलिस्तीनी आज़ादी का समर्थन किया। भारत दुनिया का पहला गैर-अरब देश था जिसने 1974 में फ़िलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (P.L.O) को फ़िलिस्तीनी लोगों का एकमात्र प्रतिनिधि माना और 1988 में स्टेट ऑफ़ फ़िलिस्तीन को मान्यता दी।

1990 के दशक में भारत ने इज़राइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए, लेकिन फ़िलिस्तीन के प्रति समर्थन जारी रखा। भारत ने हमेशा टू-स्टेट समाधान का समर्थन किया है, जिसमें फ़िलिस्तीन को स्वतंत्र राज्य का अधिकार मिले। 

आज भी भारत संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीनी अधिकारों के पक्ष में वोट करता है, जैसे अवैध इज़राइली बस्तियों की निंदा करते हुए। लेकिन मोदी सरकार के दौर में इज़राइल के साथ रक्षा और तकनीकी समझौते बढ़े हैं, जो फ़िलिस्तीन के साथ ऐतिहासिक दोस्ती को कमज़ोर कर रहे हैं। यह ‘डी-हाइफ़नेशन’ नीति, जिसमें इज़राइल और फ़िलिस्तीन को अलग-अलग देखा जाता है, असल में फ़िलिस्तीन के मज़लूम लोगों के साथ अन्याय है।

भारत ने फ़िलिस्तीन को मानवीय सहायता भी दी है और रामल्लाह में अपना प्रतिनिधि कार्यालय खोला है। लेकिन गाज़ा संकट में भारत की आवाज़ धीमी रही है, जो उसके ऐतिहासिक रुख से अलग है। 

क्या यह मोदी इज़राइल यात्रा फ़िलिस्तीन के साथ भारत के संबंधों को बर्बाद कर रही है?

Gaza israel atankwad


भारत की विदेश नीति: शांति या रक्षा समझौते?

भारत हमेशा शांति और अहिंसा का समर्थक रहा है, लेकिन इज़राइल जैसे देश के साथ गठबंधन पर सोचना चाहिए। यह यात्रा शायद रक्षा समझौतों और आर्थिक फ़ायदे के लिए है, लेकिन गाज़ा के मज़लूम लोगों के ख़ून पर दोस्ती नहीं बननी चाहिए।

पाठकों, आप क्या सोचते हैं? टिप्पणी करें – क्या यह दोस्ती सही है या गाज़ा के विरुद्ध?

(यह ब्लॉग पोस्ट वर्तमान समाचार रिपोर्ट्स जैसे इज़राइली सरकार की घोषणाओं और अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर आधारित है। विचार सच्चाई की तलाश में हैं।)

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